महान वैज्ञानिक नागार्जुन और अमृत की खोज

प्राचीन समय से लेकर अब तक हर कोई मृत्यु के भय से आक्रांत है । इसी भय से मुक्ति पाने के लिए कुछ वैज्ञानिको ने समय – समय पर कार्य किया । जिनमें से प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक नागार्जुन भी एक थे । इतिहास के अनुसार नागार्जुन सन १०५५ में ढांक नामक नगर के सम्राट हुआ करते थे । किन्तु उनकी रूचि राज काज से अधिक ज्ञान – विज्ञान के अनुसंधान में थी । अपनी इसी रूचि के रहते नागार्जुन ने अपने ही महल में एक बड़ी प्रयोगशाला का निर्माण करवाया था, जिसमें वह पारस और अमृत की खोज के लिए विभिन्न जड़ी – बूटियों और धातुओं पर प्रयोग – परिक्षण करते रहते थे । अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए नागार्जुन देश – विदेश के प्रसिद्ध रस – वैज्ञानिक और साधको की मदद भी लेते थे । लेकिन क्या यह संभव था ?
 
जी हाँ ! पातंजलि योगदर्शन में कई प्रकार की सिद्धियों और विभूतियों का वर्णन किया गया है । साथ ही बताया गया है कि इन दैवीय सिद्धियों और विभूतियों का प्राकट्य किसी में पूर्व जन्म के संस्कारों से या ओषधियों से या योग साधना से हो सकता है । महर्षि पतंजलि के इसी कथ्य के अनुसार नागार्जुन का उद्देश्य स्पष्ट था । निरंतर परिश्रम और लगन से नागार्जुन ने काफी हद तक सफलता हासिल कर ली थी । नागार्जुन के रसोध्दार तंत्र नामक ग्रन्थ में बताया गया है कि उन्होंने पारा धातु को सोने में रूपांतरण किया है और किसी भी धातु को सोने में बदला जा सकता है । अमृत बनाने के उद्देश्य में भी वह काफी हद तक सफल हो चुके थे । किन्तु तभी एक अनहोनी हुई, जो इस प्रकार है –
 
नागार्जुन की ज्ञान – विज्ञान के प्रति रूचि उन्हें राज व्यवस्था के प्रति उदासीन बना रही थी । जिससे राज्य में अव्यवस्था उत्पन्न होने लगी । यह देखकर राजा नागार्जुन के शुभचिंतक मंत्रियों ने उन्हें वस्तुस्थिति समझाने की कोशिश की । उन्होंने बताया कि राज्य में आतंरिक उपद्रवी तत्व पनप रहे है । यदि अभी उनका सिर नहीं कुचला गया तो विदेशी आक्रमण की पूरी संभावना है ।
 
वस्तुस्थिति को समझकर नागार्जुन बोला – “ तुम्हारी बात सही है मित्रों ! किन्तु मुझे न तो धन की चिंता है, ना ही विदेशी आक्रमण की । क्योंकि मेरे स्वर्ण का खजाना कभी खाली नहीं होने वाला । रही बात आक्रमण कारियों की तो उनकी सम्पूर्ण सेना को मैं थोड़ी सी ओषधि से ही मौत की नींद सुला सकता हूँ ।” इतना सुनकर भी मंत्री संतुष्ट नहीं हुए और आग्रहपूर्वक बोले – “ महाराज ! वो सब ठीक है, किन्तु एक राजा का राज्य के प्रति इस तरह उदासीन रहना, प्रजा के लिए चिंता का विषय हो सकता है ।”
 
समस्या की गंभीरता को समझते हुए नागार्जुन ने कहा – “ अगर ऐसा ही है तो आप युवराज को बुलाइए । मैं अपना मुकुट उसके मस्तक पर रख देता हूँ । बाकि राज्य सञ्चालन की शिक्षा आप लोग उसे दे दीजियेगा । मैं तो जब तक अपने उद्देश्य को सफल नहीं बना लेता, किसी दुसरे कार्य पर ध्यान नहीं दे सकता ।”
मंत्री राजा नागार्जुन की जिद को जानते थे अतः उन्होंने युवराज के राज्याभिषेक के समारोह का आयोजन किया और उसे गद्दी पर बिठा दिया । अब नागार्जुन पूर्ण रूप से राजकाज की चिंताओं से मुक्त होकर एकाग्रचित हो अपने लक्ष्य में लग गया ।
 
अमृत की खोज के लिए नागार्जुन ने विभिन्न प्रदेशों से तरह – तरह की जड़ी – बूटियों का संग्रह करना शुरू कर दिया । सोना बनाने के प्रयोग तो वह पीतल, ताम्बे और पारा आधी किसी भी धातु पर कर सकता था लेकिन अमृत के प्रयोग – परिक्षण के लिए उसे एक मानव शरीर की आवश्यकता थी । किन्तु इस कार्य के लिए कोई भी अपने प्राण संकट में डालने के लिए क्योंकर तैयार होगा । अतः नागार्जुन ने अपने ही शरीर को एक तपस्वी की तरह प्राणों का मोह छोड़ प्रयोग – परिक्षण का साधन बना लिया । इस प्रकार कई बार कुछ जड़ी – बूटियों के प्रयोग के कारण उनके शरीर पर अच्छे बुरे प्रभाव पड़े और मरण तुल्य कष्ट भी सहे । नागार्जुन काफी सहन शील बन चुके थे । लेकिन उन्हें केवल अपना लक्ष्य प्राप्त करना था । सम्पूर्ण मानव जाति के लिए अमृत बनाना था । अंततः वह अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर थे ।
 
संयोग से एक दिन नागार्जुन का बेटा प्रयोगशाला में उनसे मिलने आया । पिता नागार्जुन ने प्रसन्नतापूर्वक उसे अपनी पूरी प्रयोगशाला का हर एक कोना दिखाया और बोले – “ बेटा ! जो कार्य प्राचीनकाल के आयुर्वेदाचार्य नहीं कर सके, बहुत ही जल्द वह मैं करने वाला हूँ । भगवान धन्वन्तरि की कृपा से अमृत बनाने वाली सारी ओषधियाँ जुटा ली है । बस अब उनका सही अनुपात में अनुप्रयोग करना बाकि है । इसके पश्चात् मैं इस सम्पूर्ण संसार से मृत्यु के भय को दूर कर दूंगा और पृथ्वी पर स्वर्ग का अवतरण करूँगा ।”
 
पिता की बात सुनकर युवराज बड़ा खुश हुआ किन्तु इसके साथ ही उसे यह भय भी हुआ कि कहीं पिताजी का कार्य समाप्त होने के बाद इन्होने राज्य वापस ले लिया और ये अमर हो गये तो मुझे तो राज्य करने मौका भी नहीं मिलेगा । ऐसा सोचकर वह वहाँ से चला गया । लेकिन उसने इस बात की चर्चा अपने मित्र मंत्रियों से की । मुर्ख मंत्रियों ने उसे पिता के भय से छुटकारा पाने की सलाह दी । स्वार्थ के वशीभूत होकर राजकुमार ने अपने ही पिता को षड्यन्त्र पूर्वक प्रयोगशाला के साथ नष्ट कर डाला ।
 
इस तरह नागार्जुन का अमृत बनाने का सपना तो साकार नहीं हो सका लेकिन नागार्जुन पारद – विज्ञान और रस – रत्नाकर नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ दे गया जो आज भी चिकित्सा के क्षेत्र में अमूल्य देन है । धातुओ से भस्म का निर्माण करके चिकित्सा करने को कीमियागिरी कहते है, विदेशों में भी प्रसिद्ध है । यह नागार्जुन की ही देन है जो रसायन – विज्ञान के क्षेत्र में उन्होंने इतना बड़ा योगदान दिया ।

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