महात्मा बुद्ध का उपदेश | परमज्ञान की तीसरी मंजिल

एक बार एक नवयुवक ने आत्मबोध करने के लिए महात्मा बुद्ध से दीक्षा ली । उसने दीक्षा तो ले ली लेकिन कई दिन बीतने पर भी उसे आत्मबोध नहीं हुआ । प्रतिदिन वो बुद्ध के उपदेश सुन – सुनकर बोर होने लगा । आखिर एक दिन उसने सोचा कि “ ये सब पागल है जो बार – बार उन्हीं उपदेशों को सुनते रहते है । इससे कोई ज्ञान प्राप्ति नहीं होनी ।” आखिर उसके सब्र के बांध टूट ही गया और वह तथागत के पास गया और बोला – “ भगवान् ! आप मुझे परमज्ञान दे सकते है तो बताइए, अन्यथा मैं यह सब छोड़ रहा हूँ ।”
 
बुद्ध ने कहा – “ जरुर छोड़ देना, लेकिन जाते – जाते एक कहानी सुनते जाओ ।”
 
बुद्ध ने कहानी सुनानी शुरू की । एक बार की बात है, किसी नगर में दो धनी सेठ रहते थे । दोनों ही के पास अतुल्य धन – वैभव था । दूर – दूर तक दुसरे नगरों में उनकी संपन्नता के किस्से मशहूर थे । अपने अपार धन – वैभव को लेकर उन दोनों में आपस में होड़ लगी रहती थी ।
 
वो अक्सर बाजार में ही मिलते थे । एक दिन पहला सेठ पहली बार दुसरे सेठ के घर गया तो उसने देखा कि दूसरा सेठ एक विशाल और सुन्दर, तीन मंजिले मकान में रहता था । जबकि पहले सेठ का मकान इससे कम सुन्दर और दो मंजिला ही था । उस नगर में सेठ का तीन मंजिला मकान चारों दिशाओं में कहीं से भी देखा जा सकता था । यह आलिशान मकान देखकर पहले सेठ को बड़ा अचम्भा हुआ । वह खुद को दुसरे सेठ से छोटा महसूस करने लगा । उसके अहंकार को बड़ी ठेस लगी ।
 
विचार ने इच्छा का रूप लिया और इच्छा को आकांक्षा बनते देर न लगी । पहले सेठ ने तुरंत उससे भी सुन्दर और बड़ा मकान बनाने का निश्चय किया । सेठ से मिलने और आतिथ्य ग्रहण करने के बाद वह अपने घर चल दिया । रास्तेभर उसके दिमाग में दुसरे सेठ का तिमंजिला मकान घूम रहा था ।
 
जैसे ही वह घर पहुंचा, उसने तुरंत अपने सेवक को नगर के सर्वश्रेष्ठ वास्तुकार को बुलाने के लिए भेजा । 
 
वास्तुकार (कारीगर) आया तो सेठ ने उससे कहा – “ मुझे पड़ोसी नगर के सेठ के जैसा ही सुन्दर और तिमंजिला मकान चाहिए, जितनी जल्दी हो सके, उतना जल्दी बनाओं ।” और उसी दिन काम शुरू करने को कहा ।
 
कारीगर गया और मजदुर बुला लाया और काम शुरू कर दिया । उसने सबसे पहले नींव खोदनी शुरू की । पूरा दिन नींव के गड्ढे खोदने में चला गया । क्योंकि मकान तिमंजिला बनाना था अतः गड्ढे भी गहरे खोदने थे ।
 
जब शाम को सेठ काम का मुआयना करने आया तो उसने देखा कि “ कारीगर ने बहुत गहरे गड्ढे खुदवाये है । ऐसे तो काफी दिन लग जायेंगे ।”
 
उसने तुरंत कारीगर को बुलाया और पूछा – “ इतने गहरे गड्ढे किसलिए है ?”
 
कारीगर बोला – “ सेठजी ! तिमंजिला मकान बनाना है तो नींव भी मजबूत होनी चाहिए, उसके बाद पहली मंजिल और दूसरी मंजिल भी मजबूत होनी चाहिए । समय तो लगेगा लेकिन मैं काम अच्छा करना चाहता हूँ, ताकि आपको कोई शिकायत का मौका न मिले ।”
 
सेठ ने कहा – “ मुझे सीधे तिमंजिला मकान चाहिए । नींव और पहले, दुसरे की तुम चिंता न करो ।”
 
कारीगर ने कहा – “ यह संभव नहीं है, सेठजी ।”
 
सेठ बोला – “ बना सकते हो तो बोलो वरना मैं कोई दूसरा कारीगर देखता हूँ ।”
 
कारीगर ने कहा – “ सेठजी ! नींव के गड्ढे गहरे खोदे बिना मैं ये तिमंजिला मकान नहीं बना सकता । आप चाहे तो दूसरा कारीगर देख लीजिये ।”
 
सेठ ने नाराज होकर कहा – “ ठीक है तुम जाओ, मैं कोई दूसरा देख लूँगा ।” इतना सुनते ही वह कारीगर काम छोड़कर चला गया ।
 
अब महात्मा बुद्ध उस शिष्य से पूछा – “ क्या उस सेठ का तिमंजिला मकान किसी कारीगर ने बनाया होगा ?”
 
तब शिष्य बोला – “ भगवान् ! वो सेठ मुर्ख है । उसे इतना भी नहीं पता कि बिना गहरी और मजबूत नींव के भी कोई मकान बनाया जा सकता है, भला !”
 
बुद्ध बोले – “ हाँ ! वो सेठ तो मुर्ख है ही, लेकिन मुझे वैसा ही एक सेठ मेरे सामने बैठा दिखाई दे रहा है, जो मुझसे गुण – कर्म – स्वभाव की मजबूत नींव बनाये बिना ही परमज्ञान की तीसरी मंजिल बनाने का आग्रह कर रहा है ।”
 
इतना सुनते ही शिष्य बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा ।

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