वासनाओं के आकर्षण से कैसे बचे | महर्षि कौत्स और कण्व की कहानी - अध्यात्म सागर

वासनाओं के आकर्षण से कैसे बचे | महर्षि कौत्स और कण्व की कहानी

vasanao ke akarshan se mukti


वासना के आकर्षण के बारे में बात करने से पहले आइये हम जान लेते है कि आखिर वासना है क्या चीज़ ? हालाँकि अहसासों के स्तर पर आप वासना से भली प्रकार परिचित है लेकिन क्योंकि अहसासों को देखा और समझा नहीं जा सकता । इसलिए मैं आपके सामने वासना का एक ऐसा रूप प्रस्तुत करूंगा, जिसे बोद्धिक स्तर पर समझना आसान हो । यही मेरा तरीका है । आप तो जानते ही है, जब तक पहेली समझ न आ जाये, उसे सुलझाना नामुनकिन है । अतः आइये, पहले पहेली को समझते है ।

वासना की पहेली एक ऐसी पहेली है जो प्रत्येक मनुष्य के जीवन में आज नहीं तो कल एक समस्या बनकर उभरती है । अब कुछ विरले ही होते है जो इस ज्वलंत पहेली को सुलझाना जरुरी समझते है, उन्हें आध्यात्मिक रूप से जागृत कहा जा सकता है । बाकि को आप कुछ भी कहिये ।

वासना की उत्पत्ति हमारे दैनिक जीवन की इच्छाओं से होती है । वासना अर्थात इच्छाओं में वास करना अर्थात बार बार कुछ विशिष्ट इच्छाओं के बारे में चिंतन करना ही उनके प्रति वासना कहलाता है। अतः हम कह सकते है कि प्रत्येक वासना एक इच्छा होती है लेकिन प्रत्येक इच्छा एक वासना हो, यह जरुरी नहीं । जब आप किसी इच्छा को इस कदर पकड़ लेते है कि उसे लेकर आप अपना भला - बुरा सोचना बंद कर देते है, अपने विवेक का उपयोग करना बंद कर देते है । तब उसे वासना कहा जाता है । अब वो खाने की, पीने की, सोने की, देखने की, सुनने की या और कुछ करने की हो । कामवासना भी वासना का ही एक प्रकार है । जो युवाओं में खासतौर से देखी जाती है । वासना को यदि आसक्ति कहा जाये तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।

वासना कैसे होती है ? इसे हम एक उदाहरण से समझते है । बचपन में मुझे शक्तिमान देखने का बड़ा शौक था । दोपहर के दो बजे, जब स्टार उत्सव पर शक्तिमान शुरू होता था । उस समय मैं स्कूल में होता था । समय का बराबर ध्यान रखता था और निश्चित समय पर कक्षा से फरार होकर शक्तिमान देखता था । इसे मेरी वासना कहा जा सकता है, क्योंकि शक्तिमान देखने के लिए मैं अपनी कक्षा छोड़कर घर भाग आता था । अर्थात मैं अपनी पढाई को उपेक्षित करता था ।

“जब किसी इच्छा के वशीभूत होकर इन्सान अपना भला – बुरा सोचना बंद कर दे तो उसे वासना कहते है ।”

वासना को एक प्रकार का नशा भी कह सकते है। क्योंकि नशेड़ी इन्सान भी अपना भला – बुरा सोचना बंद कर देता है ।

वासना तो आप समझ गये लेकिन क्या वासना बन जाने के डर से इच्छाओं का दमन सही है ? या इच्छाओं के प्रति उपेक्षा वृति सही है ? इसे समझने के लिए महर्षि कौत्स और कण्व की यह पौराणिक कथा सुनिए

महर्षि कौत्स और कण्व की कहानी

एक बार की बात है, जब कौत्स ऋषि, महर्षि कण्व के आश्रम में तपस्या कर रहे थे । दोनों गुरु – शिष्य अपने सभी कार्य एक साथ ही करते थे । एक दिन गुरु और शिष्य दोनों लकड़ियाँ लेने के लिए जंगल गये हुए थे । लकड़ियाँ जुटाते – जुटाते उन्हें थोड़ी देर हो गई अतः महर्षि कण्व ने कौत्स को कुछ समय पूर्व आश्रम जाने को कहा । गुरु की आज्ञा शिरोधार्य करके कौत्स ने लकड़ियाँ उठाई और आश्रम की ओर चल दिए ।

कौत्स जब आश्रम आ रहे थे, तब उन्होंने एक अतिरुपवती सुन्दर स्त्री को मार्ग में चोट से पीड़ित देखा । कौत्स एक क्षण के लिए रुके और कुछ सोचने लगे । आखिरकार वह अपनी राह को चलते बने । कुछ समय पश्चात् उसी राह से महर्षि कण्व भी आये । जब उन्होंने उस युवती को चोट से पीड़ित कराहते देखा तो अपने शिष्य की अधूरी साधना की सच्चाई जानकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ । उन्होंने लकड़ियों का गट्ठर वहीं छोड़ दिया और उस स्त्री को अपने कंधे का सहारा देकर आश्रम ले आये और औषधियों से उसका चिकित्सा उपचार किया ।

तत्पश्चात उन्होंने अपने शिष्य कौत्स को बुलाया और पूछा – “ वत्स ! जब तुम्हें यह युवती मार्ग में कष्ट से पीड़ित अवस्था में दिखाई दी तो तुमने इसकी कोई सहायता क्यों नहीं की ? इसे आश्रम लाकर तुम्हें इसका चिकित्सा उपचार करना चाहिए था । क्या मेरी शिक्षा में कोई भूल रह गई है ।”

गुरु के ऐसे वचनों को सुनकर कौत्स ने लज्जा से सिर झुका लिया और बोले – “ गुरुदेव ! आप व्यथित मत होइए ! आपकी शिक्षा में कोई भूल नहीं रही है । मुझे ही अपनी संयमशीलता पर संदेह था कि कहीं उस अतिसुन्दर स्त्री के रूप सौन्दर्य को देखकर मैं अपनी साधना से विचलित न हो जाऊ । इसीलिए मैं उसे वहाँ उपेक्षित छोड़कर चला आया ।”

महर्षि कण्व अपने शिष्य के ऐसे निर्दोष वचनों को सुनकर गंभीर होकर बोले – “ वत्स ! क्या सौन्दर्य की उपेक्षा करने से सौन्दर्य से विरक्ति हो जाएगी ? मनोभावों को छिपाने, उनकी उपेक्षा करने या दमन करने से कभी भी उनका समाधान नहीं हो सकता । यदि तुमने ऐसा किया तो अनुकूल वातावरण में वह प्रकट हुए बिना नहीं रहेंगे । इसलिए यदि वासनाओं के आकर्षण से बचना है तो वैसे ही वातावरण में रहकर आत्म नियंत्रण का अभ्यास करना चाहिए । क्या तैरना कभी सूखे में सीखा जा सकता है ? नहीं ! तो आत्म नियंत्रण का अभ्यास एकांत में कैसे हो सकता है ?”

इस कहानी से स्पष्ट है कि इच्छाओं का त्याग नहीं बल्कि इच्छाओं के प्रति आसक्ति अर्थात वासना का त्याग होना चाहिए । लेकिन प्रश्न अब भी ज्यों का त्यों है ।

वासनाओं के आकर्षण से कैसे बचे ?

इसका उत्तर मेरे उदहारण में छुपा है । जैसाकि मैंने बताया है । बचपन में मुझे शक्तिमान देखने का बड़ा शौक था । इसलिए मैं स्कूल से भागकर शक्तिमान देखने आता था । लेकिन अब यदि मैं चाहू तो पूरा शक्तिमान ऑनलाइन देख सकता हूँ । लेकिन मेरी बिलकुल भी इच्छा नहीं होती । क्यों ? क्योंकि अब मैं समझता हूँ कि मेरे पास शक्तिमान देखने से ज्यादा महत्वपूर्ण कार्य पड़े है ।

बस ! यही रहस्य है, किसी भी प्रकार की वासना से मुक्ति पाने का – “जब इन्सान के हाथ कोई अधिक महत्वपूर्ण चीज़ लग जाती है तो कम महत्वपूर्ण चीज़ अपने आप छुट जाती है ।” सोचिये ! जब आप बच्चे थे । तब आपको खिलोनों से बड़ा प्रेम था, लेकिन क्या अब आप खिलोनों से खेलते है ? नहीं ना ! इसी तरह जिन चीजों पर आज आप जान छिड़कते है, कल उन्हें देखना भी पसंद नहीं करेंगे । यही जीवन की सच्चाई है । इस सत्य और तथ्य को जितना जल्दी समझ सके, उतना ही अच्छा है ।

संयम साधना और योग अध्यात्म की राह ऐसा ही एक राजमार्ग है, जिसपर चलकर आप सांसारिक वासनाओं से आसानी से मुक्ति पा सकते है ।

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जय श्री कृष्णा ! प्रणाम !
वासनाओं के आकर्षण से कैसे बचे | महर्षि कौत्स और कण्व की कहानी वासनाओं के आकर्षण से कैसे बचे | महर्षि कौत्स और कण्व की कहानी Reviewed by Adhyatma Sagar on मई 21, 2018 Rating: 5

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