राजा भोज का स्वप्न और सत्य का दिग्दर्शन - अध्यात्म सागर

राजा भोज का स्वप्न और सत्य का दिग्दर्शन

raaja bhoj ka svapna or satya ka darshan ki kahani


राजा भोज उनके समय के बड़े ही साहसी, प्रतापी और विद्वान राजा थे । कहा जाता है कि राजा भोज ने अपने समय में सभी ग्रामों और नगरो में मंदिरों का निर्माण करवाया था । राजा भोज प्रजा की सुख सुविधाओं का बड़ा ही खयाल रखते थे । इतिहास से यह भी विदित होता है कि राजा भोज धर्म, कला, भवन निर्माण, खगोल विद्या, कोश रचना, काव्य, ओषध शास्त्र आदि के विद्वान थे । उनकी इसी विद्वता के रहते एक कहावत प्रचलित हुई – “कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तैली ”

राजा भोज ने अपने राज्य में बड़े बड़े बाग – बगीचे, मंदिर, तालाब आदि बहुत से सार्वजानिक स्थानों का निर्माण करवाया था । इस बात का राजा को बड़ा ही अभिमान था ।

एक दिन राजा भोज गहरी नींद में सो रहे थे तभी उन्हें एक स्वप्न आया । स्वप्न में उन्होंने देखा कि एक तेजस्वी व्यक्ति उनके सामने आ खड़ा हुआ है । राजा भोज ने उससे पूछा – “ तुम कौन हो ?”

वह तेजस्वी व्यक्ति बोला – “ राजन ! मैं सत्य हूँ, मैं तुझे तेरे कर्मों की सच्चाई बताने के लिए प्रकट हुआ हूँ । मेरे पीछे – पीछे चला आ !”

राजा तो जानता था कि उसने बहुत सारे पूण्य और परमार्थ के कार्य करवाए है अतः वह निश्चिन्त होकर प्रसन्नता पूर्वक उस तेजस्वी पुरुष के पीछे – पीछे चल दिया ।

तेजस्वी पुरुष राजा भोज को सबसे पहले बाग – बगीचों में ले गया । अपने बाग – बगीचों की सुन्दरता को देखकर राजा भोज बड़ा खुश हुआ जा रहा था । तभी तेजस्वी पुरुष ने एक पेड़ को छुआ तो तुरंत सुख गया और उसके सारे पत्ते झड गये । देखते ही देखते सत्य ने सारे पेड़ – पौधे छुए और सबका यही हाल हुआ । यह देखकर राजा भोज बड़ा दुखी हुआ ।

उसने आश्चर्यचकित होकर सत्य से इसका कारण पूछा लेकिन उसने कोई जवाब न देकर पीछे आने का संकेत देकर आगे चल दिया । वह राजा को उन भव्य मंदिरों में ले गया जो दिखने में अप्रतिम सुन्दर पतित हो रहे थे । जैसे ही सत्य ने उन्हें छुआ, वह भी ढहने लगे और देखते ही देखते खंडहर हो गये ।

इस तरह सत्य ने राजा को उसके द्वारा किये गये हर अच्छे कर्म की वास्तविकता का बोध कराया और सबकी दुर्दशा होती देख राजा बड़ा दुखी हुआ । जिनके बलबूते पर राजा अपनी महानता की ढींगे हांकता था उनकी वास्तविकता को देख राजा बड़ा ही हताश और निराश हो गया । वह सिर पकड़कर वही बैठ गया ।

तब सत्य बोला – “राजन ! दुखी न हो, सत्य को समझो । जिन वस्तुओं को तुम पूण्य का साधन मान रहे थे, असल में वह कुछ भी नहीं है । पूण्य वस्तुओं से नहीं, प्रत्युत व्यक्ति की भावना से आँका जाता है । तुमने अभिमान पूर्वक अपने शान – शौकत और यश कीर्ति को बढ़ाने के लिए बड़े – बड़े बाग़ – बगीचे और मंदिरों का निर्माण करवाया । किन्तु उनका पूण्य कुछ भी नहीं है । जो कर्म सच्चे ह्रदय से, निस्वार्थ भाव से, कर्तव्य परायण होकर किये जाते है, असल में वही पूण्य है । किसी जरूरत मंद व्यक्ति की सही समय पर सेवा करना, करोड़ो रूपये के दान से अधिक श्रेयस्कर है ।

किसी भी प्रकार की कामना से प्रेरित होकर, अपने अहम् की तुष्टि के लिए, किसी लोभ से प्रेरित होकर किया गया कोई भी कर्म पूण्य नहीं हो सकता । अतः वास्तविकता को समझो और पूण्य का अर्जन करो । तुम धार्मिक प्रवृति के हो अतः मैं तुम्हे वास्तविकता से अवगत कराने आया हूँ।”

इतना कहकर वह तेजस्वी पुरुष अन्तर्धान हो गया । उसके जाते ही राजा की नींद खुल गई। राजा गंभीरतापूर्वक स्वप्न पर विचार करने लगा । अब उसे समझ आ चूका था कि उसका पूण्य मिट्टी के बराबर भी नहीं है।

शिक्षा – मनुष्य जीवन का सारा खेल पाप और पूण्य का खेल है । जिन कर्मों के करने से आत्मा निर्भय, प्रसन्न और आनंदित होता है, उन्हें पूण्य कहते है । इसके विपरीत जिन कर्मों के करने से आत्मा में भय, लज्जा, ग्लानी, दुःख, अप्रसन्नता आदि का प्रकटीकरण हो, उन्हें पाप कहते है । यह पाप और पूण्य की सबसे सरल और स्पष्ट परिभाषा है, जिसके आधार पर हम अपने कर्मों की समालोचना कर सकते है ।
राजा भोज का स्वप्न और सत्य का दिग्दर्शन राजा भोज का स्वप्न और सत्य का दिग्दर्शन Reviewed by Adhyatma Sagar on मार्च 13, 2018 Rating: 5

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