शक्ति और सिद्धियों का आधार – संयम - अध्यात्म सागर

शक्ति और सिद्धियों का आधार – संयम

shaktiyo or siddhiyon ka aadhar


शक्ति, उर्जा, सिद्धियों, विभूतियों और अतीन्द्रिय क्षमताओं के बारे में आपने अवश्य पढ़ा, सुना या देखा होगा । लेकिन क्या आप जानते है कि ये कहाँ से और कैसे आती है ? शायद और शायद नहीं ! तो आइये जानते है कि क्या है, क्या है इनका आधार, सिद्धांत और रहस्य ?

हो सकता है, आप सोचते हो कि “मेरे अधिकांश लेखो में आपको कोई विशेष विधि क्यों नहीं मिलती है ?” तो इसका सीधा सा जवाब है कि “मैं चाहता हूँ कि कोई भी विधि बताने से पहले मैं आपके सारे कांसेप्ट क्लियर कर दूँ । ताकि गलती की कोई गुंजाइश ही ना हो और आप मुझे गालियाँ ना दो, कि मैंने कुछ बताया और उसने काम नहीं किया ।”

आज हम शक्तियों और सिद्धियों के सिद्धांत के बारे में चर्चा करेंगे । असल में होता यह है कि जिसके पास शक्ति या सिद्धि होती है, उसे भी पता नहीं होता कि वो उसके पास क्यों और कैसे है ? क्योंकि उसने कभी जानने की कोशिश ही नहीं की होती है । बस वो किसी मन्त्र या विधि को पकड़े रहता है और उसका काम चलता रहता है । लेकिन इसके पीछे छुपा विज्ञान उसे पता हो ही, यह जरुरी तो नहीं ।

हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने योग की खोज एक विशुद्ध विज्ञान के रूप में की थी । जहाँ आधुनिक वैज्ञानिक परमाणु की बाल की खाल निकालने के पीछे पड़े है, वही हमारे प्राचीन ऋषि उससे कई गुना सूक्ष्म प्राण और चेतना पर प्रयोग करते थे । उन्हीं प्रयोग, परीक्षण और परिणामों का संग्रह करके उन्होंने योगशास्त्र की रचना की । आगे चलकर यह कई शाखाओं में विभक्त हुआ । जो तंत्र, मन्त्र और यंत्र विज्ञान आदि विभिन्न नामों से प्रसिद्ध हुए ।

जिस तरह भौतिक विज्ञान सज्जन लोगों के हाथ पड़ने पर विकास और दुर्जन लोगों के हाथ पड़ने पर विनाश करता है । उसी तरह योग विज्ञान से भी विकास और विनाश दोनों संभव है । तंत्र विज्ञान के मारण, मोहन, उच्चाटन और वशीकरण इसका प्रत्यक्ष उदहारण है । इसलिए यह विज्ञान गलत लोगों के हाथ लगने से बचाया जाता है । मेरा भी आपसे विनम्र निवेदन है कि यदि कभी भी आपमें इस प्रकार की शक्तियों का प्रादुर्भाव हो तो भूलकर भी उनका दुरुपयोग न करें । मुझे अपने गुरु की चेतावनी है, अतः मैं भी आपको सावधान करना जरुरी समझता हूँ । अब हम अपनी बात शुरू करते है ।

वास्तव में इस दुनिया में जितने भी जादू और चमत्कार देखे या किये जाते है । जिन शक्ति, सिद्धियों और विभूतियों की बात की जाती है, उन सबका आधार है - संयम । यह आपको बहुत छोटा शब्द लग रहा होगा । लेकिन इसकी व्याख्या बहुत बड़ी है । सामान्यतया संयम निग्रह अर्थात नियंत्रण को कहते है । लेकिन योगर्शन के अनुसार यहाँ संयम से तात्पर्य है “त्रयमेकत्र संयमः अर्थात धारणा, ध्यान और समाधि का समुच्चय कहलाता है”।

यदि आपने योगदर्शन पढ़ा हो तो आपको पता होगा कि जिस किसी में भी संयम किया जाता है, योगी के सामने उसके सारे रहस्य खुल जाते है । जैसे “प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम्” अर्थात दुसरे के चित्त की वृत्ति में संयम करने से उसके चित्त का ज्ञान होता है । इसी सूत्र के अनुसार जो व्यक्ति संयम जानता है, वो किसी का भी दिमाग पढ़ सकता है । “बलेषु हस्तिबलादीनि” अर्थात हाथी के बल में संयम करने से हाथी के समान बल प्राप्त होता है । इसी तरह सिंह, वायु, जल आदि से भी बल प्राप्त किया जा सकता है । “भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात्” अर्थात सूर्य में संयम करने से समस्त लोकों का ज्ञान होता है ।

यह कुछ सूत्र है जो मैंने योगदर्शन से आपके लिए प्रस्तुत किये है । इसमें संशय जैसा कुछ नहीं है क्योंकि मैंने स्वयं ने एक बार अपनी शीत निवारण के लिए उष्णता में संयम किया था और कुछ ही समय में मुझे गर्मी का अहसास होने लगा । यह ऐसा ही है जैसे जब आप वर्तमान से बहुत अधिक परेशान हो जाते है तब आप अपने अतीत की यादों को ताजा करके प्रसन्न हो उठते है । यह तो एक बहुत छोटा सा प्रयोग है जो मैंने आपको बताया । इसके और भी विस्तृत प्रयोग है ।

जितने भी जादू या चमत्कार है जैसे मेस्मेरिस्म, हिप्नोटिस्म, टेलीकाइनेसिस, टेलीपैथी और दृष्टिबंध आदि जितने भी कारनामे है, सबमें संयम का प्रयोग किया जाता है । फिर वो जादूगर चाहे किसी मन्त्र से होने का ही दावा क्यों न करता हो ।

वास्तव में मन्त्र जो होता है वह संयम बनाने का एक माध्यम होता है । इस रहस्य को प्रयोक्ता भी नहीं जानता, लेकिन यही सच्चाई है । वही मन्त्र यदि किसी सामान्य व्यक्ति को दे दिया जाये तो वह उससे कोई चमत्कार नहीं कर सकता । क्योंकि उसे विधि और प्रयोग नहीं आता है । सारा खेल संयम का है ।

मन्त्र से धारणा अर्थात एक निरंतर प्रवाह बनाना आसान होता है । धारणा प्रगाड़ होने पर ध्यान की स्थिति बनती है अर्थात ध्येय पर स्थिर होने की योग्यता आ जाती है । जब ध्याता और ध्येय दोनों एकाकार हो जाते है तो समाधि की अवस्था होती है । इन तीनो को ही सम्मिलित रूप से “संयम” कहा जाता है । संयम की योग्यता प्राप्त करने का मतलब है योग विज्ञान में पीएचडी करना । मतलब इसके बाद आपके लिए प्रयोगों और परीक्षणों का क्षेत्र खुला है ।

अब यदि आध्यात्मिक साधनाओं या देवी – देवताओं को सिद्ध करने की बात की जाये तो वहाँ भी इस संयम का भरपूर प्रयोग होता है । संयम एक ऐसा फोर्मुला है । जिसे आप किसी भी आध्यात्मिक समीकरण में लगा दो । आपको रिजल्ट मिल जायेगा । मैंने इसका प्रयोग अलग – अलग इष्ट पर किया और मुझे मेरी साधना में सकरात्मक परिणाम मिले ।

कुण्डलिनी जागरण के लिए भी इसी संयम का प्रयोग अलग – अलग चक्रों पर किया जाता है । जिससे उन चक्रों से सम्बंधित सिद्धियों और विभूतियों का प्रादुर्भाव होने लगता है । मूलतः इस संयम के पीछे भी जो सूक्ष्म शक्ति काम करती है, वह प्राण ही है । प्राण को तीर कहे तो संयम उसका धनुष है । इस धनुष को सही निशाने पर लगाने के लिए जिस शिक्षा की आवश्यकता होती है । उसी को अष्टांगयोग कहते है ।
हम जिन धारणा, ध्यान और समाधि अर्थात संयम की बात कर रहे है वो योग के अन्तरंग साधन है । जितने भी बहिरंग साधन जैसे यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार है । ये सब के सब संयम तक पहुँचने की सीढ़िया है । लेकिन आपकी मंजिल संयम है । यही संयम एक प्रकार का आतिशी शीशा है, जो आपकी सम्पूर्ण उर्जा को एक जगह एकत्र करने के काम आता है ।

इस लेख में हमने केवल संयम के सिद्धांत के बारे में जाना है । योग के अंतर्गत कुछ शब्दों से मुझे बड़ा प्रेम है और संयम भी उनमें से एक है । क्योंकि यह अपने अन्दर बहुत बड़ा अर्थ लिए हुए है । आज के लिए बस इतना ही, आगामी लेख में एक नये सिद्धांत अथवा अनुप्रयोग की बात करेंगे ।

आशा है, यह लेख आपको पसंद आया होगा । हो सकता है, ये बात आपको पहले से पता हो या ये भी हो सकता है, ये बात आपके लिए बिलकुल नयी हो । जो भी हो । कमेंट के माध्यम से अपने अनुभव हमारे साथ साझा करें । यदि आपका अपना कोई प्रश्न या सुझाव हो तो जरुर बताये । धन्यवाद !
शक्ति और सिद्धियों का आधार – संयम शक्ति और सिद्धियों का आधार – संयम Reviewed by Adhyatma Sagar on मार्च 23, 2018 Rating: 5

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