स्वाध्याय का महत्त्व और लाभ - अध्यात्म सागर

स्वाध्याय का महत्त्व और लाभ

स्वाध्याय का महत्त्व

svadhyay ka mahatva or vidhi


स्वाध्याय का सीधा मतलब है – स्वयं का स्वयं के द्वारा अध्ययन । सामान्यतया हमारे साथ ऐसा होता है कि हम अपना अधिकांश समय दुसरे मनुष्यों तथा वस्तुओं का अध्ययन करने में निकाल देते है । परिणामस्वरूप हमारे पास स्वयं का अध्ययन करने के लिए समय ही नहीं बचता है । जब हम स्वयं को समय नहीं दे पाते है तो आस – पास के वातावरण का रंग हमारे ऊपर चढने लगता है । जो हमें दिन – प्रतिदिन कुविचारों के कीचड़ से मैला करता रहता है ।

यदि हम प्रतिदिन के अपने सभी साफ – सफाई के क्रियाकलापों को बंद कर दे, तो क्या हम स्वच्छ और स्वस्थ रह पाएंगे ? कभी नहीं ! यदि हमने घर में झाड़ू लगाना बंद कर दिया तो कुछ ही दिनों में सब जगह धुल और मिट्टी ही नजर आएगी । यदि हम एक दिन के लिए भी ना नहाये तो शरीर बदबू मारने लगता है । इसीलिए हम प्रतिदिन अपनी भौतिक साफ सफाई का ध्यान बखूबी रखते है । किन्तु क्या हम अपने मन की भी साफ – सफाई का ऐसा ही खयाल रखते है ? शायद नहीं ! क्यों ?

शायद इसलिए कि हमें उसकी गन्दगी दिखती नहीं । किन्तु यदि गहराई से विचार किया जाये तो काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, कपट, पैशुनता, हिंसा, असत्य, स्तेय, अब्रह्मचर्य, अशौच, ईश्वर में अश्रृद्धा और अविश्वास, परिग्रह और भय आदि इसी वातावरण के कीचड़ की गन्दगी है जो हमारे विचारों तथा संस्कारों को प्रदूषित करती रहती है । जब कोई ध्यान नहीं दिया जाता तो यही कुविचार हमारे मन की गहराइयों में जमने लगते है जिन्हें संस्कार कहा जाता है । आपने तो सुना होगा –

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम् ॥ 
मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है, जो मन विषयों में आसक्त हो तो बंधन का कारण बनता है और निर्विषय अर्थात वीतराग हो जाता है तो मुक्ति अर्थात मोक्ष का कारण बनता है ।


हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि स्वाध्याय में कभी प्रमाद नहीं करना चाहिए । स्वाध्याय मन की मलिनता को साफ करके आत्मा को परमात्मा के निकट बिठाने का सर्वोत्तम मार्ग है । अतः प्रत्येक विचारवान व्यक्ति को प्रतिदिन संकल्पपूर्वक सद्ग्रंथो का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए ।

स्वाध्याय के लाभ

१ . जो हमेशा स्वाध्याय करता है, उसका मन हमेशा प्रसन्नचित और शांत रहता है ।

२ . स्वाध्याय से ज्ञानवर्धन होता है, जिससे धर्मं और संस्कृति की सेवा होती है ।

३ . स्वाध्याय से अज्ञान और अविद्या का आवरण हटने लगता है और वेदादि शास्त्रों के दिव्य ज्ञान का प्राकट्य होता है ।

४ . प्रतिदिन स्वाध्याय करने से बुद्धि बहुत तीव्र हो जाती है । कठिन से कठिन विषय के तुरंत समझ लेती है । विश्वास नहीं होता तो अभ्यास करके देख लो ।

५ . जो साधक प्रतिदिन स्वाध्याय करते है वे कभी भी साधना से भटकते नहीं तथा जो बिना स्वाध्याय के साधना करेगा । उसकी साधना कभी सफल नहीं हो सकती ।

६ . जो प्रतिदिन स्वाध्याय करता है, उसकी बुद्धि इतनी सूक्ष्म हो जाती है कि वह प्रकृति के रहस्यों को स्वतः जानने लगता है ।

७ . जो प्रतिदिन साधना करता है, वही उच्चस्तरीय साधनाओं का अधिकारी हो सकता है ।

८ . जिन्हें ईश्वर में श्रृद्धा और विश्वास नहीं होता, उन्हें चाहिए कि प्रतिदिन स्वाध्याय करें तथा प्रतिदिन ईश्वर के दिए हर उपहार के लिए ईश्वर को शुक्रिया अदा करें ।

९ . अध्यात्म सागर पर जो कुछ भी लिखा गया है, यह सब लेखक के स्वाध्याय का ही परिणाम है । जीवन में यदि साधना – स्वाध्याय – संयम और सेवा हो तो हर कोई ऋषि – महर्षि हो सकता है ।

१० . लोग व्यक्तित्व विकास (personality development) की classes करते है, जबकि स्वाध्याय से स्वतः personality development हो जाता है ।

स्वाध्याय कैसे करें ?

यदि इस लेख को पढ़कर आप भी स्वाध्याय का मन बना चुके है तो आपके सामने सबसे पहले यह प्रश्न आएगा कि स्वाध्याय कैसे करे ? चिंता मत कीजिये ! यह बहुत आसान है । स्वाध्याय के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात है समय निकालना । तो इसके लिए अध्यात्म सागर की सलाह है कि आप जब सुबह नहा – धोकर ध्यानादि करते हो तो उसके बाद का समय स्वाध्याय के लिए निकाल सकते है । यदि आप ध्यानादि नहीं भी करते हो तो कोई बात नहीं । क्योंकि कुछ दिन स्वाध्याय करने के बाद आप स्वतः ध्यान करने लगेंगे । यदि नहीं करते है तो फिर आप अपनी सुविधा से कोई भी ऐसा समय निकाल सकते है जब आप शांतचित्त हो, कोई काम का टेंशन ना हो । स्वाध्याय सुबह, दोपहर, शाम या रात को भी किया जा सकता है । सुबह और शाम का स्वाध्याय उत्तम है, दोपहर का मध्यम है तथा रात का स्वाध्याय तीसरी श्रेणी में आता है । इसके बारे में लेखक का कोई अनुभव नहीं ।


स्वाध्याय हमेशा ध्यानपूर्वक और तन्मयता से करें । थोड़ा किन्तु गहन चिंतन के साथ किया गया स्वाध्याय बहुत लाभकारी होता है । स्वाध्याय के लिए जो भी पुस्तक निर्धारित की जाये, उसे क्रमबद्ध रूप से पढ़े । स्वाध्याय के समय अपने पास एक पेन और डायरी अवश्य रखे तथा जो भी बात आपको उपयोगी लगे उसे नोट कर ले । एकाग्रतापूर्वक स्वाध्याय करने से सभी बाते आपको लम्बे समय तक याद रहने लगेगी ।

स्वाध्याय कितने समय तक करें

स्वाध्याय के लिए समय की कोई सीमा नहीं है । आप यदि फ्री हो तो दिनभर कर सकते है किन्तु दिनभर का याद रहेगा नहीं । सामान्यतया हर कोई दिनभर फ्री नहीं हो सकता अतः स्वाध्याय के लिए आप कमसे – कम ३० – ६० मिनट का समय अवश्य दे । यदि इतना समय ना मिल सके तो किसी धार्मिक पुस्तक का एक पृष्ठ प्रतिदिन पढने का नियम बना ले । यदि कोई इतना भी नहीं करना चाहे तो प्रतिदिन किसी महापुरुष का एक सबसे अच्छा सद्वाक्य पढ़कर अपने ३ मित्रों को अवश्य सुनाएँ । इतना तो कर ही सकते है ।

स्वाध्याय के लिए पुस्तकें

स्वाध्याय के लिए इतना विशेष याद रखे कि किसी उपन्यास, कहानी और कथा को पढ़ना स्वाध्याय नहीं है । अधिकांश किताबे केवल मनोरंजन के लिए होती है ।अतः स्वाध्याय के लिए केवल शास्त्रोक्त किताबों का ही अध्ययन करे । इसके लिए गीता, योगवाशिष्ठ, योगदर्शन, उपनिषद, रामायण और वेद उत्तम है । किन्तु सभी संस्कृत में है तथा कोई हिंदी में होते हुए भी समझ से बाहर लगे तो आप स्वाध्याय के लिए निम्नलिखित लेखकों के पुस्तकों की सूचि देखे । प्रतिदिन स्वाध्याय के लिए आप अध्यात्म सागर का स्वाध्याय संग्रह भी पढ़ सकते है ।
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।। ॐ शांति विश्वं ।।
प्रणाम !!!
स्वाध्याय का महत्त्व और लाभ स्वाध्याय का महत्त्व और लाभ Reviewed by Adhyatma Sagar on जून 15, 2017 Rating: 5

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