नियमितता एक अनिवार्य आवश्यकता - अध्यात्म सागर

नियमितता एक अनिवार्य आवश्यकता

नियमितता एक अनिवार्य आवश्यकता


bachcho ki kahaniya

शिक्षाप्रद बच्चो की कहानी

एक बार एक गाँव में सोमनाथ नामक एक किसान रहता था । एक पत्नी और एक बच्चे के सिवाय सोमनाथ का इस दुनिया में कोई नहीं था । सोमनाथ अपना हर कार्य स्वयम करने में विश्वास रहता था । अतः उसे कभी – कभी खेतों से आने में एक पहर रात बीत जाया करती थी । इसलिए कभी – कभी बहुत दिनों तक सोमनाथ के बेटे मनोज को पिताजी के दर्शन नहीं होते थे ।

एक दिन मनोज ने पाठशाला से आकर सीधे माँ से पूछा, “ माँ ! पिताजी कहाँ है ? बहुत दिनों से दिखे नहीं ।”

माँ बोली – तेरे पिताजी खेत पर गये हुये है । रात को देर से आते है और सुबह जल्दी चले जाते है । इसलिए तुझे नहीं दीखते है ।

मनोज – पिताजी ऐसा क्यों करते है ? तो माँ बेटे को समझाने लगी ।

चाँद की ओर इशारा करते हुये माँ बोली – देख इस चाँद की तरफ, क्या यह हमेशा दीखता है ?

मनोज बोला – नहीं ! किन्तु चाँद में खुद की रोशनी नहीं होती है, यह तो सूर्य की रौशनी चमकता है ।
माँ – हां ! तेरे पिताजी भी चाँद की ही तरह है, जिन्हें खेत का सूरज अपने नियम से चमकाता है ।
यह सुन मनोज हंसने लगा ।

मनोज – तो माँ यह बताओ कि सूरज प्रतिदिन उदय और अस्त क्यों होता है ?

माँ – यह सवाल तू अपने मास्टरजी से करना । ठीक !

दुसरे दिन पाठशाला में मनोज ने याद रखकर अपने मास्टरजी से पूछा, “ मास्टरजी ! सूर्य उदय और अस्त क्यों होता है ?”

मास्टरजी – “ सूर्य उदय और अस्त नहीं होता वह तो अपनी जगह  स्थिर है, किन्तु पृथ्वी अपनी धुरी पर सूर्य का २४ घड़ी में एक चक्कर लगती है, इससे दिन – रात होता है । जितने समय तक पृथ्वी का जो भाग सूर्य के सामने रहता है, उतना समय वह दिन रहता है और इसके विपरीत भाग में रात रहती है । पृथ्वी १२ महीनों में सूर्य का एक परिभ्रमण पूर्ण करती है, जिसे एक वर्ष कहते है ।”

आज मनोज को एक नयी बात पता चली थी । उसने आगे पूछा – पृथ्वी सूर्य का परिभ्रमण क्यों करती है ?

मास्टरजी बोले – इस ब्रह्माण्ड में सब वस्तुएं गतिमान है, पृथ्वी, चंद्रमा, सूर्य, ग्रह –नक्षत्र नदियाँ, पर्वत – पहाड़, तुम और मैं । बस फर्क सिर्फ इतना हैं कि कोई द्रुत गति से गतिमान है तो कोई धीरे । “ जो रुकता है, वह नष्ट हो जाता है ।” यही प्रकृति का नियम है । इसलिए हमें हमेशा सार्थक कार्यों में लगे रहना चाहिए । “गति ही जीवन है, जड़ता ही मृत्यु है ।”

मास्टरजी की यह बात मनोज के मन में घर कर गई । अब वह दिन रात जब कभी भी समय मिलता पढ़ता रहता था । अब वह मित्रों के साथ खेलने भी जाता तो निश्चित समय से अधिक नहीं खेलता । जब उसके मित्र ज़िद करने लगते तो वह कहता, “ आवश्यकता के अनुरूप खेलना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है, किन्तु अनावश्यक रूप से अत्यधिक खेलना समय की बर्बादी है ।”

उसके मित्रों ने उसकी इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया । उल्टा उसे पढ़न्तु – पढ़न्तु करके चिड़ाते रहते थे । वह भी उनकी बातों पर कोई ध्यान ना देकर अपनी पढाई पर ध्यान देता था ।

एक दिन उनकी पाठशाला में एक संस्था द्वारा एक छात्रवृत्ति परीक्षा का आयोजन किया गया । जब परिणाम घोषित हुआ तो केवल एक बालक उतीर्ण हुआ और वह था – मनोज ! मनोज को उस संस्था की ओर से सम्पूर्ण शिक्षा निशुल्क प्रदान कराने की छात्रवृत्ति दी गई ।

मास्टरजी ने मनोज से अपनी सफलता का रहस्य पूछा तो मनोज बोला – मेरी सफलता का रहस्य केवल इतना है कि मैंने प्रकृति के सतत नियमितता के नियम का पालन किया है । मैं नियमित रूप से हमेशा अपने समय का सार्थक उपयोग करने की कोशिश करता था ।

थोड़ा – थोड़ा किन्तु यदि नियमित परिश्रम किया जाये तो एक दिन सफलता मिलना अवश्यंभावी है 
नियमितता एक अनिवार्य आवश्यकता नियमितता एक अनिवार्य आवश्यकता Reviewed by Adhyatma Sagar on फ़रवरी 01, 2017 Rating: 5

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